Saturday, June 3, 2017

माथा अपना फोड़ रहे हैं

इक दूजे को जोड़ रहे हैं
कुछ को लेकिन छोड़ रहे हैं

लाख बुझाने पर ना समझे
फिर उनसे मुँह मोड़ रहे हैं

जीवन में जो प्रेम सुधा रस
निशि दिन उसे निचोड़ रहे हैं

कदर नहीं रिश्तों की जिनको
रिश्ता, उनसे तोड़ रहे हैं

जो चूके, फिर वही सुमन से
माथा अपना फोड़ रहे हैं

1 comment:

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