Thursday, September 7, 2017

मानवता को रौंदकर

आज कहाँ कानून है, कैसा हुआ समाज?
मारे जाते, जो करे, अब ऊँची आवाज।।

मानवता ही धर्म है, मानवता से प्यार।
इस खातिर मरना पड़े, मरने को तैयार।।

भले करा दो चुप मुझे, रहे कलम क्या मौन?
परिवर्तन की आग को, बुझा सका है कौन??

मानवता को रौंदकर, बाँटो नहीं अधर्म।
या मानवता से बड़ा, बता कौन सा धर्म।।

अच्छे दिन भी आ गए, यूँ भारत खुशहाल।
देख कृषक की खुदकुशी, सुमन सभी बेहाल।। 

अब करते खंजर से चुप

मत रहना तू डर से चुप
और नहीं आदर से चुप

घमासान, सच का भीतर
क्यूँ रहते बाहर से चुप

दुनियावाले अपनों से
पर अपने सोदर से चुप

उचित बोलनेवाले को
अब करते खंजर से चुप

राजनीति की दहशत को
कर प्यारे मोहर से चुप

जरा सोच कितना मुश्किल
रहना हो, अन्दर से चुप

बाहर अलख जगाने को
निकल सुमन तू घर से चुप

पहले खुद से प्यार करो

अगर चाहिए प्यार तुझे तो, पहले खुद से प्यार करो|
खुद की इज्जत खुद से करके, जीवन का श्रृंगार करो||

जितनी देर खुलीं हैं आँखें, तेरी दुनिया उतनी है|
लेकिन इस दुनिया की सीमा, माँ की ममता जितनी है|
और खोल तू मन की आँखें, चिन्तन का विस्तार करो|
पहले खुद से प्यार करो| जीवन का श्रृंगार करो||

अगर बुराई है लोगों में, साथ उसी के अच्छाई|
अपनी रोज बुुराई खोजो और दूजे की सच्चाई|
मानवता ही एक धरम है, मानव सा व्यवहार करो|
पहले खुद से प्यार करो| जीवन का श्रृंगार करो||

जरा सोचना अपनी साँसों पर तेरा है वश कितना?
काम करो अपना मत सोचो यश कितना अपयश कितना?
जबतक खुशबू, सुमन का जीवन, खुशबू अंगीकार करो
पहले खुद से प्यार करो| जीवन का श्रृंगार करो||

मातृभूमि! तुझे है नमन

आपसी मेल का आचरण, नहीं शोषण नहीं हो दमन|
कर यकीं ऐ मेरे साथियों,  तभी खिलता रहे ये चमन|
मातृभूमि! तुझे है नमन||

कई भाषा यहाँ वेष है, गाँव, कस्बों का ये देश है|
यूँ तो बढ़ते रहे हम सदा, गाँव में आज भी क्लेश है|
हाल बदलो मेरे साथियों, मिलके करना पड़ेगा जतन|
मातृभूमि! तुझे है नमन||

प्यार को छोटा मत कहियो

मुहब्बत से चलता संसार,
सृजन का प्रेम-मिलन आधार|
मन सच्चा तो मिल सकता है, तुझे प्यार ही प्यार|
प्यार को छोटा मत कहियो||

भगवन से हो प्यार अगर तो कहते उसको भक्ति|
परिजन प्यारे अगर मिले तो मिलती रहती शक्ति|
जीव जगत भी प्यार का भूखा आँखें खोल निहार|
मन सच्चा तो मिल सकता है -------------

प्यार से पूजा, प्यार की पूजा, प्यार सदा ही पूजा|
प्यार हुआ तो एक जान है, मिट जाता है दूजा|
इक दूजे की सारी बातें दोनों को स्वीकार|
मन सच्चा तो मिल सकता है ----------

उसका उससे मिलना मुमकिन जिसने जिसे पुकारा|
उमर प्यार की तब छोटी जब केवल जिस्म ही प्यारा|
नफरत का भी मूल प्यार में, प्यार सुमन श्रृंगार|
मन सच्चा तो मिल सकता है --------------
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